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कहीं पैदा नहीं हुए बच्चे तो कहीं पैदा होते हैं जुड़वा बच्चे, जानें इन गाँवों की सच्चाई

16-Jun-17 12:54कहीं पैदा नहीं हुए बच्चे तो कहीं पैदा होते हैं जुड़वा बच्चे, जानें इन गाँवों की सच्चाई
कहीं पैदा नहीं हुए बच्चे तो कहीं पैदा होते हैं जुड़वा बच्चे, जानें इन गाँवों की सच्चाई

दुनिया में ऐसी कई जगह हैं जहाँ के बारे में कोई ज्यादा जानकारी नहीं है लेकिन ये जगह अपने कारनामे की वजह से जानी जाती हैं। फिलहाल हम आपके लिए लेकर आए हैं ऐसी ही कुछ जानकारियां। इनके बारे में जानकर आप भी एक पल के लिए चौंक जाएंगे। कारण यहां कोई गांव ऐसा है जहां सिर्फ महिलाएं ही रहती हैं। या फिर ऐसी जगह जहां पर लोग नंगे रहते हैं। आइए जानते हैं इन जगहों के बारे में।

 

इस गांव में मर्द बहुत कम हैं

मेघालय का एक छोटा सा गांव है मालवीनांग। यह राजधानी शिलांग से 90 किलोमीटर दूर है। भारत और बांग्लादेश की सीमा पर मौजूद यह गांव एशिया के सबसे स्वच्छ गांव के तौर पर चर्चित है। रिपोर्ट्स के अनुसार इस गांव में लड़कियां ही सबकुछ होती हैं। एक तरह से लड़कियां यहां की रानी हैं। दूूसरे शब्दों में इस गांव को महिला प्रधान भी कह सकते हैं। बच्चे भी अपने नाम के आगे मां का सरनेम लगाते हैं। लड़कियों को यहां हर काम करने की छूट हैं।

 

 

इस गांव में कोई बच्चा नहीं लेता जन्म

तमिलनाडु के मदुरई की सीरूमलाई पहाड़ियों पर एक गांव है, 'मीनाक्षीपुरम'। रिपोर्ट्स के अनुसार इस गांव में कभी किसी बच्चे का जन्म नहीं हुआ। यहां महिलाएं सातवें महीने में गोद भराई की रस्म के बाद पहाड़ छोड़ देती हैं और इसके बाद मैदानी इलाकों में चली जाती हैं। फिर सीधे डिलेवरी के बाद लौटती हैं। वैसे इसके पीछे की वजह कोई परम्परा नहीं है। दरअसल यहां आसपास कोई क्लीनिक नहीं है। इमरजेंसी के लिए कोई अस्पताल भी नहीं है।

 

 

इस गांव में 50 साल से बच्चा पैदा नहीं हुआ

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 70 किलोमीटर दूर है राजगढ़ जिले का सांका जागीर गांव। रिपोर्ट्स के अनुसार इस गांव में पिछले 50 साल से कोई डिलीवरी नहीं हुई है। हालांकि यहां इसका कारण है एक मान्यता। गांव वालों का मानना है कि यहां अगर बच्चा हुआ तो वो विकलांग होगा। वैसे कहा तो यह भी जाता है कि यहां श्याम जी का मंदिर था। उसकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए बुजुर्गों ने ही महिलाओं की डिलीवरी गांव के बाहर कराने का फरमान सुनाया था। बस इसी के बाद से गांव में यह परंपरा चली आ रही है। अभी तक गांव में बच्चे ने जन्म नहीं लिया है। अगर ज्यादा ही इमरजेंसी आ जाए तो किसी खेत में डिलीवरी करवा दी जाती है।

 

 

इस गांव में पैदा होते हैं जुड़वा बच्चे

उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद में एक गांव है उमरी। रिपोर्ट्स के अनुसार इस गांव में 1940 से जुड़वां बच्चे जन्म ले रहे हैं। यहां दादा से लेकर बच्चों तक कई लोग जुड़वां हैं। गांव वाले जहां इसे कुदरत का करिश्मा और मिट्टी पानी को जिम्मेदार मानते हैं। दूसरी तरफ हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई सहित अमेरिका के वैज्ञानिक भी यहां आकर इस मामले में जांच कर चुके हैं।

 

 

इस गांव में बिना कपड़ों के रहते हैं

हर्टफर्डशायर के ब्रिकेटवुड में एक गांव है जिसका नाम है स्पीलप्लाट्ज। रिपोर्ट्स के अनुसार इस गांव में 85 साल से लोग बिना कपड़ों के रह रहे हैं। बारह एकड़ में फैले इस गांव में 55 घर हैं। हालांकि यहां ठंड में कपड़े पहनने की आजादी है। लेकिन लोग इस बात का ख्याल रखते हैं कि नियम का पालन है।

 

 

इस गांव में रहती हैं सिर्फ महिलाएं

केन्या में एक गांव है, जिसका नाम है उमोजा। रिपोर्ट्स के अनुसार इस गांव में पुरुष प्रतिबंधित हैं। इसके मुताबिक इस गांव को 1990 में 15 रेप पीड़ित महिलाओं ने बनाया था। यहां सिर्फ महिलाएं ही रहती हैं। घरेलू हिंसा, रेप पीड़ित, यौन उत्पीड़न की शिकार, बाल विवाह का शिकार आदि से पीड़ित महिलाएं यहां रहती हैं।

 

 

इस गांव में लड़की से बन जाता है लड़का

दोमिनिकन रिपब्लिक में एक छोटा सा शहर है सलिनास। रिपोर्ट्स के अनुसार इस गांव में 12 साल में लड़की अपने आप एक लड़का बन जाती है। यहां पचास बच्चों में एक बच्चा ऐसा होता है जो पैदा तो लड़की के रूप में होता है लेकिन किशोर अवस्था तक आते-आते वह लड़का बन जाता है। मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो इसका कारण स्‍यूडोहरमोफ्रोडाइट नामक बीमारी है।

 

 

इस गांव में 3 महीने के लिए विधवा बन जाती हैं महिलाएं

उत्तरप्रदेश के देवरिया, कुशीनगर, गोरखपुर के साथ ही बिहार के कुछ इलाकों में गछवाहा समुदाय के लोग रहते हैं। ये लोग ताड़ी का काम करते हैं। ये लोग ताड़ के पेड़ से ताड़ी निकालने के लिए जाते हैं। ये पेड़ सीधे-सपाट और 50 फीट से ज्यादा ऊंचे रहते हैं, जिसमें जान का खतरा बना रहता है। अपने पतियों की सलामती के लिए महिलाएं मई से जुलाई तक विधवा महिला की तरह जीवन-यापन करती हैं। इस दौरान वो पति की सलामती की दुआ मांगती रहती हैं। ताड़ का काम खत्म होने पर एक देवी के मंदिर में पूजा होती है। तब ये महिलाएं मांग भरती हैं। इसका जश्न भी मनाती हैं।

 




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