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बॉर्डर ही नहीं, इन मसलों पर भी एक-दूसरे को आंख दिखाते रहे हैं भारत-चीन

28-Aug-17 17:46बॉर्डर ही नहीं, इन मसलों पर भी एक-दूसरे को आंख दिखाते रहे हैं भारत-चीन
बॉर्डर ही नहीं, इन मसलों पर भी एक-दूसरे को आंख दिखाते रहे हैं भारत-चीन

भारत और चीन के बीच सिक्किम के डोकलाम में लगभग तीन महीने से चला आ रहा विवाद आखिरकार खत्म हो गया है। भारत और चीन डोकलाम से अपने-अपने जवानों को पीछे हटाने पर राजी हो गए हैं। विदेश मंत्रालय के सोमवार को सामने आए बयान के मुताबिक, हाल ही के हफ्तों में भारत-चीन ने डोकलाम मुद्दे पर दोनों देशों ने एकदूसरे की चिंताओं और आपसी हितों की बात की। इसी बुनियाद पर डोकलाम से जवानों का ‘डिसइंगेजमेंट’ करने पर रजामंदी बनी। हालांकि, भारत और चीन के बीच तनाव का यह पहला मामला नहीं है। दोनों देशों के बीच ऐसे और भी कई मामले हैं, जिनके चलते भारत-चीन एक-दूसरे को आंख दिखाते रहे हैं।

सीमाओं के साथ चीन ने ब्रह्मपुत्र नदी में भी विवाद के बीज बोए हैं। यूं तो यह नदी चीन और भारत दोनों में बहती है, लेकिन चीन इस पर अपना अधिकार जताता रहा है। वह ब्रह्मपुत्र नदी पर कई बांध बना चुका है और बना भी रहा है और उसका पानी वह नहरों के जरिए उत्तरी चीन के इलाकों में ले जाना चाहता है। ब्रह्मपुत्र के पानी को रोक कर उसका उपयोग करने के इस 'लाल-इरादे' को भारत अक्सर द्विपक्षीय बातचीत में उठाता रहा है और चीन द्वारा निर्माण किए जा रहे बांधों का विरोध करता रहा है। भारत में पर्यावरण विशेषज्ञों का एक तबका ऐसा भी है, जो उत्तराखंड में पिछले साल आई बाढ़ के लिए चीन को जिम्मेदार मानता है। उनका मानना है कि चीन द्वारा किए जा रहे निर्माण ने प्रकृति के मानक नियमों का उल्लंधन किया है, जिसका भुगतान भारत को उत्तराखंड में हजारों जानें देकर चुकाना पड़ा।

 

चीन दुनिया में अपनी सैन्य शक्ति का तेजी से विस्तार करने में लगा है। हिंद महासागर के उत्तर-पश्चिम किनारे पर बसे जिबूती में चीन के सैन्य ठिकाने को भारत को घेरने की ‘स्टिंग ऑफ पर्ल्स’ नाम की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। इसके तहत चीन बांग्लादेश, म्यांमार और श्रीलंका सहित अन्य देशों में सैन्य ठिकाने और संपत्तियां विकसित कर भारत को घेरना चाहता है। चीन द्वारा अन्य देशों में ऐसे सैन्य अड्डे विकसित करने की संभावना जताई जा रही है। पिछले महीने अमेरिकी रक्षा विभाग ने संसद में पेश अपनी सालाना रिपोर्ट में कहा था कि चीन भविष्य में पाकिस्तान जैसे उन तमाम मुल्कों में सैन्य ठिकाने बना सकता है, जिनके साथ उसकी दोस्ती है।

 

भारत व चीन के बीच तिब्बत, एक बफर जोन की तरह है। भारत तिब्बत को मान्यता दे चुका है, लेकिन तिब्बती शरणार्थियों के बहाने चीन इस मसले पर अक्सर विवाद पैदा करता है। वह तिब्बतियों के धर्मगुरू दलाई लामा को भी मान्यता नहीं देता। साल 1949 में चीन ने तिब्बत पर हमला किया और इस हमले के एक वर्ष बाद यानी वर्ष 1950 में तिब्बत के लोगों ने दलाई लामा से तिब्बत की राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए अनुरोध किया गया था। वर्ष 1959 में चीन की सेना ने ल्हासा में तिब्बत पर जोरदार हमला बोल दिया था। तबसे ही दलाई लामा हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में निर्वासित जिंदगी बिता रहे हैं। धर्मशाला आज तिब्बती की राजनीति का सRिय केंद्र बन गया है। 14वें दलाई लामा के रूप में वह 29 मई 2011 तक तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष रहे थे। इस दिन उन्होंने अपनी सारी शक्तियां तिब्बत की सरकार को दे दी थीं और अब वे सिर्फ तिब्बती धर्मगुरु हैं।

 

चीन और पाकिस्तान दोनों के साथ ही हमारा सीमा विवाद है। चीन के साथ हमारी LAC -Line of Actual Control है, लेकिन इसे सीमा नहीं जाता वहीं वहीं कश्मीर में पाकिस्तान के साथ हम LOC -Line of Control शेयर करते हैं। प्रासंगिक चीन के साथ हमारा विवाद है, तो इसी पर बात करते हैं। चीन के साथ भारत के सीमा विवाद की शुरुआत 1834 में ही पड़ गई थी, लेकिन इसे सुलझाने के लिए 1981 से कोशिशें जारी हैं। दरअसल, भारत का आरोप है कि चीन ने जम्मू-कश्मीर की 41,180 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर गैरकानूनी कब्ज़ा कर रखा है। इसमें 5,000 वर्ग किलोमीटर अक्साई चीन का लद्दाखी क्षेत्र है। चीन, सीमा का निर्धारण करने वाली मैकमोहन रेखा को नहीं मानता।

 

चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर, पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से चीन के शिनझियांग को जोड़ने वाले कॉरिडोर की योजना है। यह कॉरिडोर ग्वादर से शुरू होकर काशगर तक जाएगा। अरबों डॉलर के इस प्रोजेक्ट के लिए गिलगित-बाल्टिस्तान एंट्री गेट का काम करेगा। चीन यहां हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट, रेलवे लाइन और सड़कें बना रहा है। इसके अलावा चीन पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में इकोनॉमिक कॉरिडोर बनाने की योजना पर काम कर रहा है, जिसका भारत विरोध करता रहा है। वहीं, इस बारे में चीन का कहना है कि अगर चीन और पाकिस्तान के बीच आर्थिक सहयोग से संबंधित क्षेत्र के बुनियादी ढांचे में सुधार होता है तो इससे भारत के लिए मध्य एशिया में व्यापार के रास्ते खुलेंगे।

 

चीन हमेशा से न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) में भारत के शामिल होने का विरोध करता रहा है। उसके मुताबिक़ सिर्फ परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत करने वाले देशों को ही एनएसजी में शामिल किया जाना चाहिए। चीन का तर्क है कि यदि किसी तरह की रियायत देकर भारत को सदस्यता दी जाती है तो पाकिस्तान को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए। बीते नवंबर महीने में विएना में हुई एनएसजी मेंबर्स की मीटिंग में भी चीन ने अड़ंगा लगा दिया था। एनएसजी सदस्यता के मुद्दे पर भारत को अमरीका समेत कई देशों ने सपोर्ट किया था। लेकिन चीन के वीटो की वजह से भारत का आवेदन खारिज हो गया था। इस मीटिंग में चीन ने भारत की सदस्यता का विरोध करने वाले देशों की अगुवाई की थी। तुर्की, न्यूजीलैंड, आयरलैंड, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रिया ने इस मुद्दे पर चीनी रुख का समर्थन किया।

 

पूरी दुनिया में जहां आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान की आलोचना होती रहती है। वहीं, चीन उसका बचाव करता रहता है। इसका हालिया उदाहरण पिछले महीने कश्मीर में हुई आतंकी वारदातों को लेकर भारत और अमेरिका ने इस्लामाबाद से कहा था कि वह सीमा पार आतंकवाद पर अंकुश लगाए। ठीक इसके दूसरे दिन चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लु कांग ने कहा था कि 'हमें कहना चाहिए कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे खड़ा रहा है आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सबसे आगे खड़ा है'।

 

ये तो सभी जानते हैं कि किसी दूसरे देश की यात्रा करने पर हमें आधिकारिक पासपोर्ट और यात्रा के प्रयोजन के लिए उस देश से अनुमति पत्र यानी वीजा लेना पड़ता है। यात्रा का कारण बताने और उससे संतुष्ट होने पर देश यात्रियों को वीजा जारी करते हैं। लेकिन भारत से चीन जाने वाले खासकर अरुणाचल प्रदेश के लोगों के साथ चीन ऐसा नहीं करता। 2008 से चीन भारतीयों को नत्थी वीजा जारी कर रहा है, जिसका भारत विरोध करता रहा है। चीन अरुणाचल के यात्रियों के पासपोर्ट में अपने देश के टिकट सही जगह लगाने की बजाय पासपोर्ट के पन्ने को ही स्टेपल कर देता है। जब व्यक्ति देश छोड़ने लगता है तो उस पन्ने को फाड़ दिया जाता है। यानी यात्री के चीन दौरे का कोई आधिकारिक रिकार्ड नहीं होता। आमतौर पर दूसरे देश की यात्रा करने वाले यात्रियों को किसी भी तरह से परेशान नहीं किया जाता। उस देश की सरकार भी यात्री को एक सम्मानित नागरिक मानती है। लेकिन चीन के अलावा अमेरिका भी इसका अपवाद है। अमेरिका का क्यूबा, ईरान, सीरिया और साउथ कोरिया के नागरिकों के साथ भी ऐसा ही विवाद है। हालांकि विवाद अमेरिका के चीन और वियतनाम के साथ भी थे, लेकिन बातचीत के बाद मामला सुलझ गया और अब हालात सामान्य हैं। जम्मू-कश्मीर के निवासियों को भी नत्थी वीजा चीन जम्मू-कश्मीर के लोगों को भी विवादित क्षेत्र का नागरिक मानता है। चीनी विदेश मंत्रालय के मुताबिक, ‘जम्मू-कश्मीर में भारत सरकार की भूमिका विवादित है, इसे उन्हें भी सीधे वीजा जारी नहीं किया जा सकता और इसीलिए हम यहां के नागरिकों को स्टेपल वीजा (नत्थी वीजा) जारी करते हैं।
 



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