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पाकिस्तान में कुछ इस तरह मनाया जाता था दशहरा

28-Sep-17 13:42पाकिस्तान में कुछ इस तरह मनाया जाता था दशहरा
पाकिस्तान में कुछ इस तरह मनाया जाता था दशहरा

देशभर में इस शनिवार यानी 30 सितम्बर को दशहरा मनाया जाएगा। इसकी तैयारियां तो बहुत दिन पहले से ही शुरू हो चुकी हैं। इस बार भी दशहरा पर हर साल की तरह उत्साह के साथ रावण दहन होगा। हालांकि दशहरा हर स्थान पर अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। लेकिन आपको बता दें कि पाकिस्तान के मुल्तान में भी दशहरा मनाया जाता था।

 

हिंदुस्तान के बंटवारे से पहले पाकिस्तान के मुलतान में दशहरा धूमधाम से और एक अलग ही तरह से मनाया जाता था। आज पाकिस्तान के मुलतान के हालात ऐसे नहीं हैं। अब वहां सिंधी और हिंदू तो हैं पर त्योहार मनाने की पूरी आजादी नहीं है।

 

विभाजन के बाद पाकिस्तान के मुलतान से भारत आए कुछ लोग मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में बस गए। उन्होंने वहां की दशहरा की परंपरा को करीब छह दशक पहले यहां शुरू किया। रायसेन और औबेदुल्लागंज में पाकिस्तान के मुलतान में जिस तरह दशहरा मनाया जाता था ठीक उसी तरह अब यहां मनाया जाता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि विभाजन के बाद कुछ परिवार पाकिस्तान के मुलतान से यहां आए, इनको सरकार ने यहां बसाया था। 1947 के कुछ साल बाद इन परिवारों ने यह परंपरा शुरू की। उस दौर में विस्थापित परिवार के सदस्य ही पाकिस्तानी रीति-रिवाज से दशहरा मनाते थे। बाद में इस परंपरा ने स्थानीय रूप ले लिया और यहां के लोग इसको निभाने लगे।

 


सात फीट ऊंचा 50 किलो का मुखौटा

पाकिस्तान की इस परंपरा में हनुमान बने युवक को सात फीट ऊंचा 50 किलो का मुखौटा पहनाया जाता है। करीब चालीस दिन पहले युवक का चयन करते हैं। उस युवक से इस दौरान हनुमानजी की साधना कराई जाती है। युवक इस दौरान सिर्फ दूध का सेवन करता है। दशहरा के दिन उसे विधिविधान से पांच लोग मुखौटा पहनाते हैं। यह वही लोग होते हैं जो चालीस दिन की साधना के दिन उसकी देखभाल करते हैं। खासबात है कि महावीर बनने वाले को 40 दिन तक ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है। यही नहीं, 40 दिन तक जमीन पर सोने के साथ ही उसे हर दिन शरीर पर मुलतानी मिट्टी का लेप करवाना जरूरी माना जाता है।

 


स्थानीय कमेटी द्वारा चल समारोह निकाला जाता है तो उसमें सबसे आगे मुखौटा घारण किए हुए हनुमानजी चलते हैं। इस दौरान उनकी सुध-बुध ही अलग तरह की होती है। शाम पांच बजे से शुरू हुआ दशहरा उत्सव रात 12 बजे तक चलता है। 50 किलो का मुखौटा पहन हनुमानजी रावण से करीब एक घंटा युद्ध करते हैं। उनका श्रृंगार चमेली के तेल और भगवान श्री हनुमान जी पर चढ़ाए जाने वाले सिंदूर से किया जाता है। पैरों में घुंघरु बांध दिए जाते हैं। नंगे पैर ही शोभायात्रा का पूरा सफर तय करना होता है, चाहे वह कितने ही किलोमीटर की दूरी का क्यों न हो।

 


दो बार पहनते हैं मुखौटा

दशहरा के दिन हनुमानजी जब नगर भ्रमण करते हैं तो उनके साथ चलने वाले लोग जय रघुवीर जय महावीर का जयघोष करते हैं। रायसेन में इस तरह का कार्यक्रम साल में दो बार होता है। पहला दशहरा पर्व के अवसर पर दूसरा दिसंबर माह में आयोजित होने वाले रामलीला उत्सव के दौरान।

 




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